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में अज्ञानी कवि के कंटेंट पर पूर्ण स्वामित्व मेरा है कॉपी करना वर्जित है लेकिन नाम के साथ प्रकाशित करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

Tuesday, 14 January 2014


जर गई 


इज्जत गई 

और गई ठुकराई 

अब संभालो ठाकरा

ई सूरा में काई। 


कुंवर गजेन्द्र

Thursday, 9 January 2014

देहज प्रथा और समाज 

देहज प्रथा ने आज के दौर में एक विकराल रूप धारण कर लिया है। समाज में तेजी से इस बुराई ने पांव पसारे है। देहज ना देने पर देहज हत्या , प्रताड़ना , मारपीट कि जा रही है।  देहज प्रथा को पनपाने का श्रये उच्च परिवार तथा मध्यम परिवारो को ज्यादा जा रहा है गरीब आदमी तो आज भी बेटी और रोटी से संतुष्ट है। उच्च और मध्यम परिवार अपनी झूटी शानो शोकत के लिए भविष्य के सामाजिक परिवेश के साथ खिलवाड़ कर रहे है। ऐसा ही चलता रहा तो समाज का दमन निश्चित है। देहज प्रथा पर लगाम लगाने के कानून है लेकिन सच्चाई सबको पता है कि उन कानूनो का कितना पालन किया जाता है। जब तक कड़ाई से कानूनो को लागु नहीं किया जाता तब तक यह यूँही जारी रहेगा। देहज प्रथा को खत्म करने कि  पहल  सभ्य समाज कहलाने वाले उच्च व मध्यम परिवारो को ही करनी होगी। वर्ना एक दिन हमें पछताने तक  का मौका भी नहीं मिलेगा।  
लेखन 
कुंवर गजेन्द्र