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में अज्ञानी कवि के कंटेंट पर पूर्ण स्वामित्व मेरा है कॉपी करना वर्जित है लेकिन नाम के साथ प्रकाशित करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

Saturday, 8 February 2014


कही नहीं दीखता मुझे महाराणा आपके भाले सा तेज यहाँ , 
कही नहीं दिखती मुझे आपकी वो प्रतिज्ञा आज यहाँ ,
कही नहीं सुनाई देती आपके चेतक की टाप यहाँ, 
कही नजर ना आते मुझको भामाशाह आज यहाँ  ,
सुनी पड़ी वो हल्दी घाटी करे पुकार ,
लौट आओ महाराणा ,
मेरा राजपुताना खतरे में आज यहाँ।  

कुंवर गजेन्द्र

Thursday, 6 February 2014

राजपूती संस्कार

किसी भी देश समाज तरक्की उसके युवाओं पर निर्भर करती है नया जोश नई ताक़त लेकिन जिस तरह राजपूत समाज का युवा समाज के प्रति अपनी सामाजिक जिम्मेदारी , मूल्यो , राजपूती संस्कारो से आज पाश्चत्य संस्कृति और वक्त का हवाला देकर राजपूती संस्कृति को खत्म किया जा रहा है वो हमारे लिए दुखदाई है शायद आने वाली तीन चार पीढ़ियों के बाद इन सब का पतन निश्चित है। इस संस्कृति के ह्यस को रोकने के लिए युवाओ को ही आगे आना होगा। साथ ही समाज विचारको के भी सोचने का यही समय है कि किस प्रकार राजपूत युवाओ को एक नई दिशा प्रदान करे। आप सभी राजपूत युवा साथियों से अनुरोध है कि जिस तरह आप अपने इतिहास पर गर्व करते है सम्मानित महसूस करते है उसी प्रकार अपनी संस्कृति, अपने आदर्श, अपने मूल्यो, पर भी गौरान्वित महसूस करे साथ ही अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति भी गंभीर हो तथा समाज उत्थान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे। समाज हमारा है संस्कृति हमारी है तो जिम्मेदारी भी हमारी बनती है।

लेखन 
 कुंवर गजेन्द्र  

तबियत

गैरो से क्या रखू  वफ़ा कि उम्मीद यारो 
जब मेरी तबियत ही मेरे शरीर से बेफवाई कर रही है। 

 कुंवर गजेन्द्र  

हाउक

दुनिया ने खूब आजमाया मेंरे हुनर को यारो
पर में भी वक़्त का मारा था 

जवाब भी अपने पसीने की महक से दिया। 

कुंवर गजेन्द्र