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में अज्ञानी कवि के कंटेंट पर पूर्ण स्वामित्व मेरा है कॉपी करना वर्जित है लेकिन नाम के साथ प्रकाशित करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

Tuesday, 25 November 2014

यक़ीन


कई बार टूट कर बिखरा हूँ 


पर


खुद पे इतना यक़ीन है की मंजिल तो पा ही लूँगा।।।


लेखन  कुंवर गजेन्द्र  


Tuesday, 14 October 2014

राजपूत राजपूत से जलता है

"ये राजपूतों की फितरत है दोस्तों....

यहाँ हर एक को एक दुसरे की टांग खिचाई करनी पड़ती है

दुश्मन की ज़रूरत यहाँ नहीं पड़ती..

यहाँ राजपूत राजपूत से जलता है...!!"

लेखन  कुंवर गजेन्द्र  

Saturday, 8 February 2014


कही नहीं दीखता मुझे महाराणा आपके भाले सा तेज यहाँ , 
कही नहीं दिखती मुझे आपकी वो प्रतिज्ञा आज यहाँ ,
कही नहीं सुनाई देती आपके चेतक की टाप यहाँ, 
कही नजर ना आते मुझको भामाशाह आज यहाँ  ,
सुनी पड़ी वो हल्दी घाटी करे पुकार ,
लौट आओ महाराणा ,
मेरा राजपुताना खतरे में आज यहाँ।  

कुंवर गजेन्द्र

Thursday, 6 February 2014

राजपूती संस्कार

किसी भी देश समाज तरक्की उसके युवाओं पर निर्भर करती है नया जोश नई ताक़त लेकिन जिस तरह राजपूत समाज का युवा समाज के प्रति अपनी सामाजिक जिम्मेदारी , मूल्यो , राजपूती संस्कारो से आज पाश्चत्य संस्कृति और वक्त का हवाला देकर राजपूती संस्कृति को खत्म किया जा रहा है वो हमारे लिए दुखदाई है शायद आने वाली तीन चार पीढ़ियों के बाद इन सब का पतन निश्चित है। इस संस्कृति के ह्यस को रोकने के लिए युवाओ को ही आगे आना होगा। साथ ही समाज विचारको के भी सोचने का यही समय है कि किस प्रकार राजपूत युवाओ को एक नई दिशा प्रदान करे। आप सभी राजपूत युवा साथियों से अनुरोध है कि जिस तरह आप अपने इतिहास पर गर्व करते है सम्मानित महसूस करते है उसी प्रकार अपनी संस्कृति, अपने आदर्श, अपने मूल्यो, पर भी गौरान्वित महसूस करे साथ ही अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति भी गंभीर हो तथा समाज उत्थान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे। समाज हमारा है संस्कृति हमारी है तो जिम्मेदारी भी हमारी बनती है।

लेखन 
 कुंवर गजेन्द्र  

तबियत

गैरो से क्या रखू  वफ़ा कि उम्मीद यारो 
जब मेरी तबियत ही मेरे शरीर से बेफवाई कर रही है। 

 कुंवर गजेन्द्र  

हाउक

दुनिया ने खूब आजमाया मेंरे हुनर को यारो
पर में भी वक़्त का मारा था 

जवाब भी अपने पसीने की महक से दिया। 

कुंवर गजेन्द्र

Tuesday, 14 January 2014


जर गई 


इज्जत गई 

और गई ठुकराई 

अब संभालो ठाकरा

ई सूरा में काई। 


कुंवर गजेन्द्र

Thursday, 9 January 2014

देहज प्रथा और समाज 

देहज प्रथा ने आज के दौर में एक विकराल रूप धारण कर लिया है। समाज में तेजी से इस बुराई ने पांव पसारे है। देहज ना देने पर देहज हत्या , प्रताड़ना , मारपीट कि जा रही है।  देहज प्रथा को पनपाने का श्रये उच्च परिवार तथा मध्यम परिवारो को ज्यादा जा रहा है गरीब आदमी तो आज भी बेटी और रोटी से संतुष्ट है। उच्च और मध्यम परिवार अपनी झूटी शानो शोकत के लिए भविष्य के सामाजिक परिवेश के साथ खिलवाड़ कर रहे है। ऐसा ही चलता रहा तो समाज का दमन निश्चित है। देहज प्रथा पर लगाम लगाने के कानून है लेकिन सच्चाई सबको पता है कि उन कानूनो का कितना पालन किया जाता है। जब तक कड़ाई से कानूनो को लागु नहीं किया जाता तब तक यह यूँही जारी रहेगा। देहज प्रथा को खत्म करने कि  पहल  सभ्य समाज कहलाने वाले उच्च व मध्यम परिवारो को ही करनी होगी। वर्ना एक दिन हमें पछताने तक  का मौका भी नहीं मिलेगा।  
लेखन 
कुंवर गजेन्द्र  

Saturday, 23 November 2013

समाज के गद्दार

दोहरा चरित्र लिए घूम रहे इन समाज के गद्दारो को तो पहचानो 

जो खुद से ही खुद को नीलाम कर रहे 

समाज हितेषी के नाम पर रजपूत को गुमराह कर रहे 

क्या मर गया ज़मीर इनका जो खुद को कर रहे है किसी के अधीन 

कुछ तो शर्म करो रजपूती मर्यादा कि 

कुछ तो लिहाज रखो क्षत्रियत्व का 

कुंवर गजेन्द्र करता है विनती आपसे 

बंद करो मोल भाव मेरे समाज का

कुछ तो बात करो रजपूत कि 

उसके हक़ कि उसके ईमान कि 

रजपूती धर्म कि रजपूती पहचान कि। 


लेखन :- कुंवर गजेन्द्र

Friday, 22 November 2013

दर्द झलकता है

" कभी  जन्नत  सी  लगती  थी  वो  गलियां  

जहाँ  पनाह  थी  तेरी आज  उनका  ख्याल  भी  

आये  तो  रूह तक  कांप  जाती  है। "  

कुंवर गजेन्द्र