क्या लिखू कलम से में राजपूतों का होता दमन लिखू
या उस बर्बाद होती संस्क्रति का हस्र लिखू
या उस बेरोजगार राजपूत युवा का संघर्ष लिखू
कुछ समझ नहीं आता क्या लिखूं
उस अबला विधवा के आंसुओ की धार लिखूं
या मेरे समाज के नेताओं का विचार लिखूं
दारू में बर्बाद होते मेरे समाज का विलाप लिखू
अब भी समय है संभल जाओ वर्ना दुनिया हमारा अतीत लिखेगी।
कुंवर गजेन्द्र

No comments:
Post a Comment