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में अज्ञानी कवि के कंटेंट पर पूर्ण स्वामित्व मेरा है कॉपी करना वर्जित है लेकिन नाम के साथ प्रकाशित करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

Saturday, 23 November 2013

समाज के गद्दार

दोहरा चरित्र लिए घूम रहे इन समाज के गद्दारो को तो पहचानो 

जो खुद से ही खुद को नीलाम कर रहे 

समाज हितेषी के नाम पर रजपूत को गुमराह कर रहे 

क्या मर गया ज़मीर इनका जो खुद को कर रहे है किसी के अधीन 

कुछ तो शर्म करो रजपूती मर्यादा कि 

कुछ तो लिहाज रखो क्षत्रियत्व का 

कुंवर गजेन्द्र करता है विनती आपसे 

बंद करो मोल भाव मेरे समाज का

कुछ तो बात करो रजपूत कि 

उसके हक़ कि उसके ईमान कि 

रजपूती धर्म कि रजपूती पहचान कि। 


लेखन :- कुंवर गजेन्द्र

Friday, 22 November 2013

दर्द झलकता है

" कभी  जन्नत  सी  लगती  थी  वो  गलियां  

जहाँ  पनाह  थी  तेरी आज  उनका  ख्याल  भी  

आये  तो  रूह तक  कांप  जाती  है। "  

कुंवर गजेन्द्र 



राजपूतों वाले कर्म

राजपूत हो तो राजपूत होने का ढिंढोरा मत पिटो 
राजपूतों वाले कर्म भी करो जिससे दुनिया हम पर गर्व करे 
आज तक हम अपने पूर्वजो के इतिहास पर ही गर्व करते रहे है हमको 

भी तो कुछ 

करना है जिससे की आगे की पीढ़ी राजपूत होने पर गर्व 

करे................लेखन  :- कुंवर गजेन्द्र 

Tuesday, 29 October 2013


भैया चुनावी सीजन है 

कोई वोट मांग रहा दादा , दादी और पिता कि झूठी शहादत पर 

कोई वोट मांग रहा जात पात पर 
कोई वोट  मांग रहा कागजी  विकास पर 
कोई वोट मांग रहा धर्म कि ओठ पर 
कोई वोट मांग रहा खंजर कि नौक पर 
गली गली ये द्वारे द्वारे 
घूम फिर ये कर रहे फिर वही  झूटे वादे न्यारे न्यारे 
कोई दादी के पैर पकड़ मांगे तो कोई पापा से हाथ जोड़कर मांगे 
मुझको भी लेपटॉप का देते ये आश्वासन
दीदी  को भी कह कर गए  दूंगा गुड़िया तुझको भी साइकल 
कोई खादी में तो कोई अंग्रेजी सूट बूट में 
साथ में है चमचो कि फौज 
जीत गए तो पांच साल तक  इनकी भी होगी मौज 

लेखन  :- कुंवर गजेन्द्र 


नोट (छायाचित्र को केवल प्रतिकात्मक तौर पर दर्शाया गया है लेखक का उद्देश्य किसी के पक्ष विपक्ष में प्रचार करना नहीं है)  



में राजपूत हूँ 

भगवान राम का वंशज 
जब जब धरती पर पाप बढ़ा
मेने अवतार लिया 
कभी कृष्ण बनके यदुवंश में खेला 
तो कभी धर्म कि रक्षा के लिए महाभारत में अपनों से लड़ा ,

में राजपूत हूँ 
कभी महाराणा बन के संघर्ष किया 
तो कभी चौहान बनके 
किया सबका सर्वनाश 
ना में झुका ना में टुटा 
ना ही में रुका, 

में राजपूत हूँ 
कभी मुगलों से किया संघर्ष 
तो कभी अंग्रेजो से लोहा लिया 
कोई ना डिगा पाया मुझको ,
सर्वश्र यही बना हूँ , 

में राजपूत हूँ 
आन बान और वचन का पक्का 
में अपनी जबान का सच्चा 
में कभी अन्याय ना सहन करता 
न्याय के लिए हमेशा कटिबद्ध रहता ,

में राजपूत हूँ 
आज़ादी के लिए दिया बलिदान 
देश के लिए आज भी देता हूँ सीमा पर जान 
इसका मुझे नहीं है अभिमान,

में राजपूत हूँ 
कभी अपनों को तोड़ने में लगा था 
आज अपनों को जोड़ने में लगा हूँ 
अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा हूँ 
बस ऐसे ही घुट घुट के जी रहा हूँ ,

में राजपूत हूँ 
कभी मेरी बहादुरी के किस्से आम थे 
आज मेरी गुमनामी के चर्चे आम है 
इसी घमंड में जी रहा हूँ कि में राजपूत हूँ 

में राजपूत हूँ 
संघर्ष करता युवा हूँ 
किसी सैनिक कि विधवा का में वो आंसू हूँ 
दारु से जंग लड़ता ,
देहज से बर्बाद होता 
कुछ नहीं सूझता क्या में राजपूत हूँ ,

सच में , में राजपूत हूँ मेरी यही कहानी है। 

लेखन :- कुंवर गजेन्द्र 


















क्या लिखू कलम से में राजपूतों का होता दमन लिखू 
या उस बर्बाद होती संस्क्रति का हस्र लिखू 
या उस बेरोजगार राजपूत युवा का संघर्ष लिखू 

कुछ समझ नहीं आता क्या लिखूं 

उस अबला विधवा के आंसुओ की धार लिखूं 
या मेरे समाज के नेताओं का विचार लिखूं 
दारू में बर्बाद होते मेरे समाज का विलाप लिखू 

अब भी समय है संभल जाओ वर्ना दुनिया हमारा अतीत लिखेगी।

कुंवर गजेन्द्र